आहिस्ता आहिस्ता से गुज़रता है वक़्त
बन्द मुठ्ठी की रेत सा फ़िसल्ता है पल
करता ये बेबस मन एक ही इन्तेज़ार
काश कट जाये ये वक़्त गुज़र जाये पल
हर चेहरे पे दिखति है बढती हुई शिकन
मायूसी हताशा कि कैसी अन्त हीन सुरन्ग
सबको है बेबसी से अपनी मन्ज़िल की तलाश
काश कहीं से आ जाये एक रोश्नी सी उमन्ग