जाते हुए कदम् हमारे आज् कुछ् ठिठक् से गये
जाने किसकी नज़रोन् ने हमारी निगाहोन् को समहलने से रोका है
सारे जाने पेह्चाने चेहरे पर् एक् अनजान् को कही देखा है
हमारे घर् आनगन् मै भी एक् चान्द् को हमने देखा है
कभी छुपता कभी दिखता कभी मुस्कुराता कभी खिल्खिलाता
खुद् को भी हमने आज् किसी के लिये आहेन् भरते देखा है
ढेख् के खुद् ही मुस्कराना और् आप् हि बात् करते जाना
अपनी धड्कनो को हमने आज् बेकाबू होते देखा है
जाना कहिन् और् जाता कहिन् ,सोचता कुछ् देखटा कहिन्
मदहोश् अपने कदमो को उसकी तरफ़् खिचते हुए देखा है
कान्पते हुए होठोन् से हम् कुछ् कह् पाते उससे पहले ही
एक् ख्वाब् को हक़ीक़त् मै बदलते हुए हमने देखा है